सोमवार, 21 जून 2021

उपलब्ध संसाधन और भ्रष्टाचार

 

सामान्य रूप से यह माना जाता है की संसाधनों की धन की कमी की वजह से चीजें सही नहीं हो रही है काम नहीं हो पा रहे हैं और हम लाचार हैं परंतु वास्तव में यह सच नहीं है सच्चाई इससे बहुत अलग है परंतु अपनी सुविधा के लिए यह धारणा को बना रखा है हम किसी भी चीज से बचने के लिए मुहावरे और  भाषाओं का उपयोग करते हैं जैसे किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति के सामने अगर समस्या रखी जाती है और वह किसी भी रूप में नहीं चाहता कि इस बात को सुना जाए, इस समस्या को हल करने में कोई रुचि ली जाए या वह पहले ही वहां बहुत लीपापोती कर चुका है और उस तरफ से आपको झटक देना चाहता है तो वह कहता है कि हमारे पास कोई जादू की लकड़ी नहीं है घुमाई और समस्या हल हो गई परंतु वास्तव में देखा जाए तो सभी के पास जो अधिकार रखते हैं वह जादू की लकड़ी भी रखते हैं शर्त इतनी होनी चाहिए उस लकड़ी का दामन सिरा किसी ने बांध ना रखा हो

जो संसाधन भी हमारे पास उपलब्ध हैं उन्हीं के बल पर हम किसी समस्या का बहुत अच्छे से हल कर सकते हैं उदाहरण के लिए किसी भी सरकारी कार्यालय या रेलवे के कार्यालय में पूछताछ केंद्र के कर्मचारियों से आप बात करके देखिए ट्रेन के आने का जो समय वह बताते हैं और वास्तव में ट्रेन जिस समय आती है आज भी उसमें काफी फर्क होता है आज से 50 वर्ष पहले भी रेलवे के पास कम से कम इतने संसाधन तो थे ही कि वह ट्रेन की सही सही स्थिति का पता लगा ले और उसका आकलन करके ट्रेन के आने का सही समय बता सकें परंतु 50 वर्ष तो छोड़िए आज जब संचार क्रांति का समय है इतने संसाधन हाथों में हैं उसके बावजूद भी न तो एक्यूरेट समय बता पाते हैं ,न प्लेटफार्म न बोगी की सही सही पोजीशन आज भी नहीं बता पाते हैं कई बार बताई गई पोजीशन एकदम विपरीत आती है या प्लेटफार्म एन टाइम पर बदल जाता है सभी जानते हैं इससे यात्री, बुजुर्ग महिला बच्चे सामान लेकर एन टाइम पर प्लेटफार्म बदलना कितना कष्टकारी होता है परंतु इस बात से इन लोगों को कोई फर्क नहीं पढ़ता ना ही इसके लिए वह अफसोस जाहिर करते हैं यह उनका रूटीन कार्य है दूसरी बात पूछताछ केंद्र हो या कोई भी सरकारी कार्यालय हों, आपके किसी भी प्रश्न ,पूछताछ को अवांछित मानते हैं आपने कुछ पूछा तो ऐसा दिखाया जाता है कि उनके सर पर आपने आक्रमण कर दिया हो बात का उत्तर, लहजा सभी यह बताता है ,आपको उत्तर चाहे स्पष्ट हो या ना हो एक प्रश्न पूछ कर आप खुद ही उसका चेहरा और मोहरा देखकर आगे कोई बात ही नहीं पूछेंगे जबकि किसी भी कर्मचारी ,अधिकारी या जनसेवक का कार्य जनसेवा है और जनता की किसी भी समस्या को सुनना और उसे हल करने में जनता का हर तरह से सहानुभूति पूर्ण सहयोग करना अनिवार्य दायित्व है अपनी ड्यूटी करते हुए उन्हें न केवल अपनी ड्यूटी से प्यार करना है बल्कि अपनी ड्यूटी करते हुए अपने आपको विनम्र हंसमुख भी रखना है यह भी अनिवार्य ड्यूटी है ना कि बुरा सा मुंह बनाकर यह जवाब देना कि मेरे पास कोई जादू की लकड़ी नहीं है यह आपराधिक कार्य माना जाना चाहिए परंतु यह रूटीन है और रूटीन तो इससे आगे भ्रष्टाचार रिश्वत तक सामान्य  माना जाता है

किसी सरकारी कार्यालय में दुगने कर्मचारी नियुक्त कर दिए जाएं तो क्या समय पर सुचारू रूप से इमानदारी पूर्वक कार्य होने लगेगा आप बताइए

किसी नवनिर्मित चमचमाते हुए भवन में किसी सरकारी कार्यालय को शिफ्ट कर दिया जाए और सारी आधुनिक सुविधाएं वहां लगा दी जाएं देखकर आपकी आंखें चौंधिया जाए ऐसा चमचमाता हुआ पूरा भवन परन्तु क्या उससे कार्य की गुणवत्ता में गति में कर्मचारियों की प्रसन्नता में कार्य क्षमता में कोई वृद्धि होगी ? 2 वर्ष के बाद चमचमाता हुआ भवन आपको किस अवस्था में मिलेगा क्या आप बता सकते हैं मैं समझता हूं उपरोक्त बातों का उत्तर नकारात्मक ही होगा बुनियादी सुविधाएं जो आवश्यक है वह मिलना ही चाहिए परंतु उनके बिना कार्य नहीं होगा ठीक से नहीं होगा समय पर नहीं होगा भ्रष्टाचार तो होगा ही यह सब हमारी सरकारी मान्यता का सरकारी कार्यप्रणाली का प्रमुख अंग है जहां कार्य को बोझ समझा जाता है और शिकायत का बहुत बुरा माना जाता है और इक्का-दुक्का कार्यवाही जो इसके खिलाफ होती हैं उससे इस व्यवस्था का बाल भी बांका नहीं होता ना हो सकता है शायद यह उनका लक्ष्य भी नहीं रहता

कोई भी मुनाफा कमाता धंधा,व्यापार ,उद्योग या सेवा या कार्य सरकारी कर्मचारी ,अधिकारियो के हाथ में दे दिया जाए तो अगले कुछ ही वर्षो में उसकी स्थिति दयनीय मिलेगी यह हकीकत है और सबसे अधिक सैलरी भत्ते ,मोटी रिश्वत भी ये ही लेते है यह वर्षो की लागातार प्रेक्टिस है और यह पत्तो पर कार्यवाहियां करने से या रूटीन कार्यवाही करने से इसका बाल भी बांका नही हुआ, हो भी नही सकता

इन हालातो में यह तस्वीर हरगिज बदली नही जा सकती जबतक कर्णधारो में ईमानदार इच्छाशक्ति का उदय नही होता तब तक कुछ भी नही हो सकता अभी बाते करने के अलावा कही भ्रष्टाचार मिटाने की ईमानदार इच्छाशक्ति कही दिखाई नही देती है  

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